सनातन साहित्य में कुछ रचनाएँ ऐसी हैं जो समय की सीमाओं से परे हैं — जो सदियों पहले लिखी गईं, पर आज भी उतनी ही जीवंत, उतनी ही पावन और उतनी ही हृदयस्पर्शी लगती हैं। "श्रित कमलाकुच" ऐसी ही एक अमर रचना है — महाकवि जयदेव के कालजयी ग्रंथ गीत गोविन्द का वह दिव्य श्लोक जो भगवान श्री हरि की महिमा को शब्दों में नहीं, अनुभूति में पिरोता है।
गीत गोविन्द — जिसे संस्कृत साहित्य का सर्वश्रेष्ठ गीतिकाव्य माना जाता है — उसमें जयदेव जी ने श्री कृष्ण के हर रूप को, हर लीला को, हर भाव को इस तरह शब्दों में ढाला है कि पाठक पढ़ते-पढ़ते भक्ति में डूब जाए, गाते-गाते वैकुण्ठ के द्वार तक पहुँच जाए।
"जय जय देव हरे" — यह केवल एक पंक्ति नहीं, यह एक संकल्प है, एक समर्पण है। जिस प्रभु ने कालिया नाग का दमन किया, मधु-मुर-नरक जैसे असुरों का नाश किया, राम रूप में रावण का संहार किया और त्रिभुवन के पालनहार बने — उन्हीं सर्वशक्तिमान देव हरे की यह स्तुति आज भी मंदिरों में, भजन मंडलियों में और भक्तों के हृदय में उतनी ही गूँजती है जितनी जयदेव के युग में गूँजती थी।
आइए, इस दिव्य रचना के एक-एक शब्द में उतरें, इसके गूढ़ अर्थ को समझें और "तव चरणे प्रणता वयम्" — प्रभु के चरणों में नतमस्तक होकर इस अलौकिक स्तुति की महिमा को आत्मसात करें। 🙏