श्रित कमलाकुच (गीत गोविन्द) |shrit kamlakuch (geet govind)

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सनातन साहित्य में कुछ रचनाएँ ऐसी हैं जो समय की सीमाओं से परे हैं — जो सदियों पहले लिखी गईं, पर आज भी उतनी ही जीवंत, उतनी ही पावन और उतनी ही हृदयस्पर्शी लगती हैं। "श्रित कमलाकुच" ऐसी ही एक अमर रचना है — महाकवि जयदेव के कालजयी ग्रंथ गीत गोविन्द का वह दिव्य श्लोक जो भगवान श्री हरि की महिमा को शब्दों में नहीं, अनुभूति में पिरोता है।

गीत गोविन्द — जिसे संस्कृत साहित्य का सर्वश्रेष्ठ गीतिकाव्य माना जाता है — उसमें जयदेव जी ने श्री कृष्ण के हर रूप को, हर लीला को, हर भाव को इस तरह शब्दों में ढाला है कि पाठक पढ़ते-पढ़ते भक्ति में डूब जाए, गाते-गाते वैकुण्ठ के द्वार तक पहुँच जाए।

"जय जय देव हरे" — यह केवल एक पंक्ति नहीं, यह एक संकल्प है, एक समर्पण है। जिस प्रभु ने कालिया नाग का दमन किया, मधु-मुर-नरक जैसे असुरों का नाश किया, राम रूप में रावण का संहार किया और त्रिभुवन के पालनहार बने — उन्हीं सर्वशक्तिमान देव हरे की यह स्तुति आज भी मंदिरों में, भजन मंडलियों में और भक्तों के हृदय में उतनी ही गूँजती है जितनी जयदेव के युग में गूँजती थी।

आइए, इस दिव्य रचना के एक-एक शब्द में उतरें, इसके गूढ़ अर्थ को समझें और "तव चरणे प्रणता वयम्" — प्रभु के चरणों में नतमस्तक होकर इस अलौकिक स्तुति की महिमा को आत्मसात करें। 🙏

श्रित कमलाकुच (गीत गोविन्द) |shrit kamlakuch (geet govind)

🙏 Shloka 1 (श्लोक १) श्रितकमलाकुचमण्डल धृतकुण्डल ए। कलितललितवनमाल जय जय देव हरे॥
🙏 Shloka 2 (श्लोक २) दिनमणिमण्डलमण्डन भवखण्डन ए। मुनिजनमानसहंस जय जय देव हरे॥
🙏 Shloka 3 (श्लोक ३) कालियविषधरगंजन जनरंजन ए। यदुकुलनलिनदिनेश जय जय देव हरे॥
🙏 Shloka 4 (श्लोक ४) मधुमुरनरकविनाशन गरुडासन ए। सुरकुलकेलिनिदान जय जय देव हरे॥
🙏 Shloka 5 (श्लोक ५) अमलकमलदललोचन भवमोचन ए। त्रिभुवनभवननिधान जय जय देव हरे॥
🙏 Shloka 6 (श्लोक ६) जनकसुताकृतभूषण जितदूषण ए। समरशमितदशकण्ठ जय जय देव हरे॥
🙏 Shloka 7 (श्लोक ७) अभिनवजलधरसुन्दर धृतमन्दर ए। श्रीमुखचन्द्रचकोर जय जय देव हरे॥
🙏 Shloka 8 (श्लोक ८) तव चरणे प्रणता वयमिति भावय ए। कुरु कुशलंव प्रणतेषु जय जय देव हरे॥
🙏 Shloka 9 — Kavi Prashasti (कवि प्रशस्ति) श्रीजयदेवकवेरुदितमिदं कुरुते मृदम्। मंगलमंजुलगीतं जय जय देव हरे॥
🙏 Samapan Shloka (समापन श्लोक) राधे कृष्णा हरे गोविंद गोपाला नन्द जू को लाला। यशोदा दुलाला जय जय देव हरे॥

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