जब मन की गहराइयों में कोई पुकार उठती है, जब आँखें बिन कहे रो पड़ती हैं, और जब होठों पर बिना किसी कोशिश के बस एक ही नाम आता है — "मोहन" — तो समझ लीजिए, यह भक्ति का वह रंग है जो एक बार चढ़ जाए, तो उतरता नहीं।
"काली कमली वाला मेरा यार है" — यह सिर्फ एक भजन नहीं, यह एक दीवाने दिल की फरियाद है। यह उस भक्त की आवाज़ है जिसने श्याम को अपना दोस्त माना है, अपना सहारा माना है, अपनी ज़िंदगी की पतवार माना है।
चित्र विचित्र जी की मधुर आवाज़ में जब यह बोल गूँजते हैं — "ओ गिरिधर, ओ काहना, ओ ग्वाला, नंदलाला... तू आ ना, तरसा ना" — तो हर सुनने वाले का मन खिंचा चला जाता है उस गोकुल की गलियों में, जहाँ एक काली कमली ओढ़े, बाँसुरी थामे वह नटखट कन्हैया आज भी अपने भक्तों के दिलों में बसता है।
इस भजन में प्रेम है, विश्वास है, समर्पण है — और सबसे बढ़कर है वह "पागल प्रीत" जो बस दर्शन की प्यासी है, किसी और चीज़ की नहीं।
आइए, इस अलौकिक भजन की भावनाओं में डूबते हैं और समझते हैं कि आखिर क्यों काली कमली वाला वह यार, आज भी करोड़ों दिलों का दिलदार है। 🙏