राम चालीसा PDF डाउनलोड करें – हिंदी में संपूर्ण पाठ और अर्थ
मर्यादा पुरुषोत्तम भगवान श्री राम का नाम केवल एक मंत्र नहीं, बल्कि जीवन की हर उलझन और अशांति को शांत करने वाली परम औषधि है। जब मन भटकता है या जीवन में धर्म और धैर्य की कमी महसूस होती है, तब श्री राम के आदर्श और उनकी भक्ति ही हमें सही राह दिखाती है। भगवान राम की कृपा पाने के लिए श्री राम चालीसा (Shri Ram Chalisa) का नित्य पाठ सबसे सरल और फलदायी माध्यम माना गया है। लेकिन भागदौड़ भरी जिंदगी में हर वक्त पूजा की पुस्तक साथ रख पाना संभव नहीं होता, और ऑनलाइन पाठ करते समय विज्ञापनों का दखल या अशुद्ध वर्तनी पाठ की लय और ध्यान दोनों बिगाड़ देती है।
आपकी इसी सुविधा के लिए हमने यहाँ श्री राम चालीसा PDF (Ram Chalisa PDF in Hindi) का एक साफ, शुद्ध और विज्ञापन-मुक्त संकलन तैयार किया है, जिसे आप बिना किसी परेशानी के 1-क्लिक में डाउनलोड कर सकते हैं। बड़े और स्पष्ट अक्षरों में तैयार की गई इस PDF में सम्पूर्ण राम चालीसा पाठ (Ram Chalisa Lyrics in Hindi) के साथ-साथ उसका सरल भावार्थ भी शामिल किया गया है, ताकि आप यात्रा में हों, ऑफिस में या घर के मंदिर में—बिना इंटरनेट के भी शुद्ध उच्चारण और समझ के साथ पाठ कर सकें।
राम चालीसा पाठ (Ram Chalisa Lyrics in Hindi)
॥ प्रारंभिक दोहा ॥
आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वाह् मृगा काञ्चनं।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणं॥
बाली निर्दलं समुद्र तरणं लङ्कापुरी दाहनम्।
पश्चद्रावनं कुम्भकर्णं हननं एतद्धि रामायणं॥।
॥ श्री राम चालीसा चौपाई ॥
श्री रघुबीर भक्त हितकारी।
सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई।
ता सम भक्त और नहीं होई॥
ध्यान धरें शिवजी मन मांही।
ब्रह्मा, इन्द्र पार नहीं पाहीं॥
दूत तुम्हार वीर हनुमाना।
जासु प्रभाव तिहुं पुर जाना॥
जय, जय, जय रघुनाथ कृपाला।
सदा करो संतन प्रतिपाला॥
तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला।
रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥
तुम अनाथ के नाथ गोसाईं।
दीनन के हो सदा सहाई॥
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं।
सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥
चारिउ भेद भरत हैं साखी।
तुम भक्तन की लज्जा राखी॥
गुण गावत शारद मन माहीं।
सुरपति ताको पार न पाहिं॥
नाम तुम्हार लेत जो कोई।
ता सम धन्य और नहीं होई॥
राम नाम है अपरम्पारा।
चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो।
तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो॥
शेष रटत नित नाम तुम्हारा।
महि को भार शीश पर धारा॥
फूल समान रहत सो भारा।
पावत कोऊ न तुम्हरो पारा॥
भरत नाम तुम्हरो उर धारो।
तासों कबहूं न रण में हारो॥
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा।
सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥
लखन तुम्हारे आज्ञाकारी।
सदा करत सन्तन रखवारी॥
ताते रण जीते नहिं कोई।
युद्ध जुरे यमहूं किन होई॥
महालक्ष्मी धर अवतारा।
सब विधि करत पाप को छारा॥
सीता राम पुनीता गायो।
भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥
घट सों प्रकट भई सो आई।
जाको देखत चन्द्र लजाई॥
जो तुम्हरे नित पांव पलोटत।
नवो निद्धि चरणन में लोटत॥
सिद्धि अठारह मंगलकारी।
सो तुम पर जावै बलिहारी॥
औरहु जो अनेक प्रभुताई।
सो सीतापति तुमहिं बनाई॥
इच्छा ते कोटिन संसारा।
रचत न लागत पल की बारा॥
जो तुम्हरे चरणन चित लावै।
ताकी मुक्ति अवसि हो जावै॥
सुनहु राम तुम तात हमारे।
तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥
तुमहिं देव कुल देव हमारे।
तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥
जो कुछ हो सो तुमहिं राजा।
जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥
राम आत्मा पोषण हारे।
जय जय जय दशरथ के प्यारे॥
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा।
नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा॥
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी।
सत्य सनातन अन्तर्यामी॥
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै।
सो निश्चय चारों फल पावै॥
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं।
तुमने भक्तिहिं सब सिधि दीन्हीं॥
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा।
नमो नमो जय जगपति भूपा॥
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा।
नाम तुम्हार हरत संतापा॥
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया।
बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन।
तुम ही हो हमरे तन-मन धन॥
याको पाठ करे जो कोई।
ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥
आवागमन मिटै तिहि केरा।
सत्य वचन माने शिव मेरा॥
और आस मन में जो होई।
मनवांछित फल पावे सोई॥
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै।
तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥
साग पत्र सो भोग लगावै।
सो नर सकल सिद्धता पावै॥
अन्त समय रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥
श्री हरिदास कहै अरु गावै।
सो बैकुण्ठ धाम को पावै॥
॥ श्री राम चालीसा दोहा ॥
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।
हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय।
जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥
प्रारंभिक दोहा (एकश्लोकी रामायण) का अर्थ
आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वाह् मृगा काञ्चनं।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणं॥
बाली निर्दलं समुद्र तरणं लङ्कापुरी दाहनम्।
पश्चद्रावनं कुम्भकर्णं हननं एतद्धि रामायणं॥
सरल भावार्थ:
श्री राम का वनगमन, स्वर्ण मृग का वध, माता सीता का हरण, पक्षीराज जटायु का मोक्ष, सुग्रीव से मित्रता, बाली का उद्धार, समुद्र पार करना, लंका दहन और अंत में कुंभकर्ण व रावण का वध—संक्षेप में यही संपूर्ण रामायण की पावन कथा है।
आध्यात्मिक संदेश:
यह श्लोक याद दिलाता है कि जीवन में चाहे कितने भी कठिन मोड़ या संघर्ष आएं, सत्य और मर्यादा के मार्ग पर चलने वाले की ही अंत में विजय होती है।
प्रमुख चौपाइयों का सरल व व्यावहारिक भावार्थ
1. शरणागति और भक्त-वात्सल्य
श्री रघुबीर भक्त हितकारी। सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई। ता सम भक्त और नहीं होई॥
भावार्थ:
हे प्रभु श्री राम! आप सदैव अपने भक्तों का कल्याण करने वाले हैं, कृपा करके हमारी विनम्र प्रार्थना स्वीकार करें। जो व्यक्ति दिन-रात अपने अंतर्मन में आपके दिव्य स्वरूप का स्मरण करता है, उसके समान निष्ठावान भक्त संसार में कोई दूसरा नहीं है।
आध्यात्मिक संदेश:
पूजा में बाहरी दिखावे से ज्यादा भाव और निरंतरता का महत्व है। जब ईश्वर का स्मरण दैनिक दिनचर्या का हिस्सा बन जाता है, तो मन स्वाभाविक रूप से शांत और एकाग्र रहने लगता है।
2. राम नाम की अपरंपार शक्ति
नाम तुम्हार लेत जो कोई। ता सम धन्य और नहीं होई॥
राम नाम है अपरम्पारा। चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥
भावार्थ:
जो भी व्यक्ति सच्चे मन से 'राम' नाम का स्मरण करता है, उसका जीवन धन्य हो जाता है। राम नाम की महिमा असीम और पारलौकिक है, जिसका गुणगान चारों वेदों ने भी मुक्त कंठ से किया है।
आध्यात्मिक संदेश:
'राम' केवल एक नाम नहीं, बल्कि एक ध्वनि और ऊर्जा है। जब व्यक्ति भय, तनाव या भटकाव में हो, तो राम नाम का जप आत्मबल को जाग्रत करता है।
3. भ्रातृ-प्रेम और निःस्वार्थ सेवा का आदर्श
लखन तुम्हारे आज्ञाकारी। सदा करत सन्तन रखवारी॥
ताते रण जीते नहिं कोई। युद्ध जुरे यमहूं किन होई॥
भावार्थ:
लक्ष्मण जी आपके परम आज्ञाकारी सेवक हैं और निरंतर संत-महात्माओं की रक्षा करते हैं। उनके असीम पराक्रम के कारण रणभूमि में उन्हें कोई पराजित नहीं कर सकता, चाहे सामने साक्षात यमराज ही क्यों न आ खड़े हों।
आध्यात्मिक संदेश:
लक्ष्मण जी निष्ठा, सेवा और कर्तव्य-परायणता के प्रतीक हैं। जहाँ समर्पण और अनुशासन होता है, वहाँ कठिन से कठिन परिस्थिति में भी विजय प्राप्त होती है।
4. परम सत्य और चारों फलों की प्राप्ति
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी। सत्य सनातन अन्तर्यामी॥
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै। सो निश्चय चारों फल पावै॥
भावार्थ:
हे प्रभु! आप ही सत्य स्वरूप हैं, सत्य के व्रत का पालन करने वाले सनातन अंतर्यामी हैं। जो भी मनुष्य सत्य के मार्ग पर चलकर आपका भजन-कीर्तन करता है, वह निश्चित रूप से धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष—इन चारों पुरुषार्थों को प्राप्त करता है।
आध्यात्मिक संदेश:
प्रभु की वास्तविक आराधना तब पूरी होती है जब हम अपने आचरण में सत्य और मर्यादा को उतारें। केवल वाणी से प्रार्थना करने के बजाय जीवन में ईमानदार रहना ही सच्ची भक्ति है।
5. मनोकामना पूर्ति और अंतःकरण की शुद्धि
याको पाठ करे जो कोई। ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥
आवागमन मिटै तिहि केरा। सत्य वचन माने शिव मेरा॥
भावार्थ:
जो भी व्यक्ति श्रद्धापूर्वक इस चालीसा का पाठ करता है, उसके हृदय में दिव्य ज्ञान और सदबुद्धि का प्रकाश होता है। भगवान शिव के वचनों के अनुसार, ऐसे भक्त को जन्म-मरण के सांसारिक चक्र से मुक्ति और परम शांति मिलती है।
आध्यात्मिक संदेश:
चालीसा का नित्य पाठ केवल सांसारिक लाभ तक सीमित नहीं है, बल्कि यह हमारे मन के संशयों और विकारों को दूर कर आत्मिक शांति का मार्ग प्रशस्त करता है।
समापन दोहे का भावार्थ
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।
हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय।
जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥
भावार्थ:
जो व्यक्ति सात दिनों तक नियमपूर्वक और एकाग्र चित्त होकर इसका पाठ करता है, उसे प्रभु श्री राम की असीम कृपा और अनन्य भक्ति की प्राप्ति होती है। जो भी भक्त राम जी के चरणों में ध्यान लगाकर यह पाठ करता है, उसकी सभी शुभ और धर्मसम्मत मनोकामनाएं अवश्य पूर्ण होती हैं।
श्री राम चालीसा पाठ करने की सही विधि और नियम
भगवान श्री राम 'मर्यादा पुरुषोत्तम' हैं, इसलिए उनकी पूजा में किसी दिखावे या भारी-भरकम तंत्र-मंत्र की जरूरत नहीं होती। वे केवल भाव, सादगी और अनुशासन देखते हैं। पाठ का पूरा आध्यात्मिक फल पाने के लिए इन आसान नियमों का ध्यान रखें:
1. सर्वोत्तम समय का चुनाव
प्रातः काल (ब्रह्म मुहूर्त): सुबह 4:00 से 6:00 बजे का समय सबसे शुभ माना जाता है। इस पहर में मन शांत रहता है और वातावरण में एक अलग ही पवित्रता होती है।
संध्या वेला (शाम का समय): यदि सुबह समय न मिल सके, तो सूर्यास्त के बाद संध्या आरती के समय हाथ-पैर धोकर पाठ करना भी बेहद फलदायी है।
2. सही आसन और दिशा
पाठ करते समय अपना मुख हमेशा पूर्व (East) या उत्तर (North) दिशा की ओर रखें। ये दिशाएं सकारात्मक ऊर्जा, ज्ञान और शांति का केंद्र मानी जाती हैं।
फर्श पर सीधे बैठने के बजाय पीले या लाल रंग के ऊनी/कुश के आसन का उपयोग करें। पीला रंग प्रभु राम और गुरु तत्व का प्रतीक है, जो मन में आध्यात्मिक भाव जगाता है।
3. पूजा स्थल की तैयारी व भोग
श्री राम दरबार (राम, सीता, लक्ष्मण और हनुमान जी) की प्रतिमा या चित्र के सामने शुद्ध गाय के घी का दीपक और सुगंधित धूप जलाएं।
प्रभु को पीले फूल (जैसे गेंदा या पीले गुलाब) अर्पित करें।
भोग के लिए घर में बनी चावल की खीर, मौसमी ताजे फल, या केवल गुड़-चना भी रख सकते हैं।
तुलसी दल अनिवार्य है: ध्यान रखें कि भोग में तुलसी का पत्ता जरूर हो, क्योंकि बिना तुलसी के प्रभु राम कोई भोग स्वीकार नहीं करते।
4. पाठ की संख्या और संकल्प
नित्य पाठ: रोजाना 1 या 3 बार शांत चित्त होकर पाठ करना पर्याप्त और सहज रहता है।
विशेष मनोकामना पूर्ति: किसी अटके हुए कार्य या संकल्प के तहत पाठ कर रहे हैं, तो लगातार 21 या 40 दिनों तक प्रतिदिन 11 बार पाठ करने का नियम लें।
संख्या से अधिक आपकी एकाग्रता और शब्दों के प्रति आदर मायने रखता है।
श्री राम चालीसा पाठ के 5 मुख्य लाभ (Benefits)
जब कोई व्यक्ति नियमित रूप से श्री राम चालीसा का पाठ करता है, तो उसके भीतर और जीवन में ये स्पष्ट सकारात्मक बदलाव दिखाई देने लगते हैं:
1. मन में धैर्य, सत्य और मानसिक शांति का विकास
आजकल की भागदौड़ भरी जिंदगी में बेचैनी और अधीरता बहुत आम हो गई है। प्रभु राम का चरित्र हमें हर कठिन परिस्थिति में शांत और संयमित रहना सिखाता है। चालीसा के नियमित पाठ से मानसिक उथल-पुथल शांत होती है, एकाग्रता बढ़ती है और व्यक्ति सच के मार्ग पर अडिग रहता है।
2. पारिवारिक कलह और नकारात्मक विचारों से मुक्ति
राम दरबार का स्वरूप ही प्रेम, त्याग और भाईचारे का सबसे बड़ा उदाहरण है। घर में नियमित राम चालीसा का पाठ होने से वातावरण में फैली नकारात्मक ऊर्जा (Negative Vibrations) दूर होती है, सदस्यों के बीच आपसी मतभेद घटते हैं और घर में एक सुखद, सामंजस्यपूर्ण माहौल बनता है।
3. अटके हुए कार्यों में सफलता और आत्मविश्वास में वृद्धि
कई बार निरंतर प्रयास के बाद भी करियर, नौकरी या व्यापार से जुड़े महत्वपूर्ण काम बिना वजह लटके रहते हैं। राम चालीसा का श्रद्धापूर्वक पाठ करने से मन से निराशा का भाव हटता है, अंदरूनी हौसला मजबूत होता है और बिगड़े हुए कामों में नए रास्ते बनने लगते हैं।
4. भय, संकट और अज्ञात चिंताओं से सुरक्षा
अगर किसी व्यक्ति को अज्ञात भय, रात में बेचैनी या भविष्य को लेकर लगातार चिंता सताती है, तो राम चालीसा एक सुरक्षा चक्र का काम करती है। जहाँ श्री राम का नाम गूंजता है, वहाँ किसी भी प्रकार की अशुभ या नकारात्मक शक्ति टिक नहीं सकती।
5. सद्गुणों का संचार और पाप कर्मों का क्षय
चालीसा हमें याद दिलाती है कि जीवन का अंतिम लक्ष्य केवल भौतिक उपलब्धियां नहीं, बल्कि आत्मिक उन्नति है। इसके नित्य पाठ से व्यक्ति के भीतर क्षमा, करुणा और निस्वार्थ सेवा जैसे दिव्य गुणों का विकास होता है, जिससे आत्मिक संतोष प्राप्त होता है।
अक्सर पूछे जाने वाले सवाल (FAQs)
Q1: क्या श्री राम चालीसा का पाठ रोज किया जा सकता है?
उत्तर: हाँ, बिल्कुल। श्री राम चालीसा का पाठ नित्य प्रतिदिन करना अत्यंत शुभ और कल्याणकारी माना जाता है। इसे अपनी सुबह या शाम की दैनिक पूजा का हिस्सा बनाने से मन दिनभर शांत, एकाग्र और सकारात्मक ऊर्जा से भरा रहता है।
Q2: क्या इस PDF को बिना इंटरनेट के ऑफलाइन पढ़ सकते हैं?
उत्तर: जी हाँ! एक बार जब आप इस फ्री PDF को अपने मोबाइल, टैबलेट या कंप्यूटर में डाउनलोड कर लेते हैं, तो इसके बाद इसे पढ़ने के लिए किसी इंटरनेट कनेक्शन की जरूरत नहीं होती। आप सफर में हों या किसी शांत जगह पर, बिना किसी विज्ञापन या रुकावट के शुद्ध पाठ कर सकते हैं।
Q3: राम चालीसा का पाठ शुरू करने के लिए कौन सा दिन सबसे शुभ है?
उत्तर: वैसे तो प्रभु राम का नाम किसी भी दिन लिया जा सकता है, लेकिन पाठ शुरू करने के लिए रामनवमी का महापर्व सर्वश्रेष्ठ माना जाता है। सामान्य दिनों में मंगलवार (हनुमान जी व प्रभु राम का दिन), गुरुवार (विष्णु स्वरूप व गुरु का दिन) या रविवार (सूर्यवंश के अधिपति का दिन) से संकल्प लेकर पाठ शुरू करना बहुत फलदायी होता है।
Q4: क्या महिलाएं भी श्री राम चालीसा का पाठ कर सकती हैं?
उत्तर: बिल्कुल, महिलाएं पूरी श्रद्धा, पवित्रता और निष्ठा के साथ श्री राम चालीसा का पाठ कर सकती हैं। प्रभु श्री राम मर्यादा पुरुषोत्तम और सबके रक्षक हैं। माता सीता सहित पूरे राम दरबार की आराधना करने से परिवार में सुख, शांति और आपसी प्रेम बढ़ता है।
निष्कर्ष व समापन (Conclusion)
प्रभु श्री राम का संपूर्ण जीवन हमें सिखाता है कि परिस्थितियां चाहे कितनी भी कठिन क्यों न हों, धैर्य, मर्यादा और सत्य का साथ कभी नहीं छोड़ना चाहिए। श्री राम चालीसा केवल चौपाइयों का दोहराव नहीं है, बल्कि यह हर दिन अपने भीतर उन्हीं राम-तत्व और नैतिक मूल्यों को जगाने का एक सशक्त माध्यम है। यदि आप दिन के मात्र 10 मिनट निकालकर इसे अपनी दिनचर्या का हिस्सा बना लें, तो यह छोटा सा नियम आपके विचारों, स्वभाव और पारिवारिक माहौल में अद्भुत शांति ला सकता है।
यदि आपको यह श्री राम चालीसा PDF उपयोगी और पढ़ने में सहज लगी हो, तो इसे अपने फोन में सहेजने के साथ-साथ अपने परिवार के सदस्यों, बड़े-बुजुर्गों और मित्रों के साथ व्हाट्सएप या सोशल मीडिया पर जरूर शेयर करें। आपके एक छोटे से साझा करने से किसी अपने के दिन की शुरुआत सकारात्मकता और प्रभु कृपा के साथ हो सकती है। सियावर रामचंद्र की जय!
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राम चालीसा पाठ (Ram Chalisa Lyrics in Hindi)
॥ प्रारंभिक दोहा ॥
आदौ राम तपोवनादि गमनं हत्वाह् मृगा काञ्चनं।
वैदेही हरणं जटायु मरणं सुग्रीव संभाषणं॥
बाली निर्दलं समुद्र तरणं लङ्कापुरी दाहनम्।
पश्चद्रावनं कुम्भकर्णं हननं एतद्धि रामायणं॥।
॥ श्री राम चालीसा चौपाई ॥
श्री रघुबीर भक्त हितकारी।
सुनि लीजै प्रभु अरज हमारी॥
निशि दिन ध्यान धरै जो कोई।
ता सम भक्त और नहीं होई॥
ध्यान धरें शिवजी मन मांही।
ब्रह्मा, इन्द्र पार नहीं पाहीं॥
दूत तुम्हार वीर हनुमाना।
जासु प्रभाव तिहुं पुर जाना॥
जय, जय, जय रघुनाथ कृपाला।
सदा करो संतन प्रतिपाला॥
तुव भुजदण्ड प्रचण्ड कृपाला।
रावण मारि सुरन प्रतिपाला॥
तुम अनाथ के नाथ गोसाईं।
दीनन के हो सदा सहाई॥
ब्रह्मादिक तव पार न पावैं।
सदा ईश तुम्हरो यश गावैं॥
चारिउ भेद भरत हैं साखी।
तुम भक्तन की लज्जा राखी॥
गुण गावत शारद मन माहीं।
सुरपति ताको पार न पाहिं॥
नाम तुम्हार लेत जो कोई।
ता सम धन्य और नहीं होई॥
राम नाम है अपरम्पारा।
चारिहु वेदन जाहि पुकारा॥
गणपति नाम तुम्हारो लीन्हो।
तिनको प्रथम पूज्य तुम कीन्हो॥
शेष रटत नित नाम तुम्हारा।
महि को भार शीश पर धारा॥
फूल समान रहत सो भारा।
पावत कोऊ न तुम्हरो पारा॥
भरत नाम तुम्हरो उर धारो।
तासों कबहूं न रण में हारो॥
नाम शत्रुहन हृदय प्रकाशा।
सुमिरत होत शत्रु कर नाशा॥
लखन तुम्हारे आज्ञाकारी।
सदा करत सन्तन रखवारी॥
ताते रण जीते नहिं कोई।
युद्ध जुरे यमहूं किन होई॥
महालक्ष्मी धर अवतारा।
सब विधि करत पाप को छारा॥
सीता राम पुनीता गायो।
भुवनेश्वरी प्रभाव दिखायो॥
घट सों प्रकट भई सो आई।
जाको देखत चन्द्र लजाई॥
जो तुम्हरे नित पांव पलोटत।
नवो निद्धि चरणन में लोटत॥
सिद्धि अठारह मंगलकारी।
सो तुम पर जावै बलिहारी॥
औरहु जो अनेक प्रभुताई।
सो सीतापति तुमहिं बनाई॥
इच्छा ते कोटिन संसारा।
रचत न लागत पल की बारा॥
जो तुम्हरे चरणन चित लावै।
ताकी मुक्ति अवसि हो जावै॥
सुनहु राम तुम तात हमारे।
तुमहिं भरत कुल पूज्य प्रचारे॥
तुमहिं देव कुल देव हमारे।
तुम गुरु देव प्राण के प्यारे॥
जो कुछ हो सो तुमहिं राजा।
जय जय जय प्रभु राखो लाजा॥
राम आत्मा पोषण हारे।
जय जय जय दशरथ के प्यारे॥
जय जय जय प्रभु ज्योति स्वरुपा।
नर्गुण ब्रहृ अखण्ड अनूपा॥
सत्य सत्य जय सत्यव्रत स्वामी।
सत्य सनातन अन्तर्यामी॥
सत्य भजन तुम्हरो जो गावै।
सो निश्चय चारों फल पावै॥
सत्य शपथ गौरीपति कीन्हीं।
तुमने भक्तिहिं सब सिधि दीन्हीं॥
ज्ञान हृदय दो ज्ञान स्वरुपा।
नमो नमो जय जगपति भूपा॥
धन्य धन्य तुम धन्य प्रतापा।
नाम तुम्हार हरत संतापा॥
सत्य शुद्ध देवन मुख गाया।
बजी दुन्दुभी शंख बजाया॥
सत्य सत्य तुम सत्य सनातन।
तुम ही हो हमरे तन-मन धन॥
याको पाठ करे जो कोई।
ज्ञान प्रकट ताके उर होई॥
आवागमन मिटै तिहि केरा।
सत्य वचन माने शिव मेरा॥
और आस मन में जो होई।
मनवांछित फल पावे सोई॥
तीनहुं काल ध्यान जो ल्यावै।
तुलसी दल अरु फूल चढ़ावै॥
साग पत्र सो भोग लगावै।
सो नर सकल सिद्धता पावै॥
अन्त समय रघुबर पुर जाई।
जहां जन्म हरि भक्त कहाई॥
श्री हरिदास कहै अरु गावै।
सो बैकुण्ठ धाम को पावै॥
॥ श्री राम चालीसा दोहा ॥
सात दिवस जो नेम कर, पाठ करे चित लाय।
हरिदास हरि कृपा से, अवसि भक्ति को पाय॥
राम चालीसा जो पढ़े, राम चरण चित लाय।
जो इच्छा मन में करै, सकल सिद्ध हो जाय॥
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